تطمئن القلوب

تطمئن القلوب

ٱلَّذِینَ ءَامَنُواْ وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُم بِذِکْرِ ٱللَّهِ ۗ أَلَا بِذِکْرِ ٱللَّهِ تَطْمَئِنُّ ٱلْقُلُوبُ

(الرعد – ۲۸)

ثم ذکر تعالى علامه المؤمنین فقال: الَّذِینَ آمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ أی: یزول قلقها واضطرابها، وتحضرها أفراحها ولذاتها.

أَلَا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ أی: حقیق بها وحریٌّ أن لا تطمئن لشیء سوى ذکره، فإنه لا شیء ألذ للقلوب ولا أشهى ولا أحلى من محبه خالقها، والأنس به ومعرفته، وعلى قدر معرفتها بالله ومحبتها له، یکون ذکرها له، هذا على القول بأن ذکر الله، ذکر العبد لربه، من تسبیح وتهلیل وتکبیر وغیر ذلک.

وقیل: إن المراد بذکر الله کتابه الذی أنزله ذکرى للمؤمنین، فعلى هذا معنى طمأنینه القلوب بذکر الله: أنها حین تعرف معانی القرآن وأحکامه تطمئن لها، فإنها تدل على الحق المبین المؤید بالأدله والبراهین، وبذلک تطمئن القلوب، فإنها لا تطمئن القلوب إلا بالیقین والعلم، وذلک فی کتاب الله، مضمون على أتم الوجوه وأکملها، وأما ما سواه من الکتب التی لا ترجع إلیه فلا تطمئن بها، بل لا تزال قلقه من تعارض الأدله وتضاد الأحکام.

ولو کان من عند غیر الله لوجدوا فیه اختلافا کثیرا وهذا إنما یعرفه من خبر کتاب الله وتدبره، وتدبر غیره من أنواع العلوم، فإنه یجد بینها وبینه فرقا عظیما.

ثم رسم القرآن سوره مشرقه للقلوب المؤمنه ، وللجزاء الحسن الذى أعده الله لها فقال – تعالى – ( الذین آمَنُواْ ) حق الإِیمان ، ( وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ الله ) أى : تستقر قلوبهم وتسکن ، بسبب تدبرهم لکلامه المعجز وهو القرآن الکریم وما فیه من هدایات .

وإطلاق الذکر على القرآن الکریم ورد فى آیات منها قوله – تعالى – ( وهذا ذِکْرٌ مُّبَارَکٌ أَنزَلْنَاهُ أَفَأَنْتُمْ لَهُ مُنکِرُونَ ) وقوله – تعالى – ( إِنَّا نَحْنُ نَزَّلْنَا الذکر وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ ) وقوله : ( أَلاَ بِذِکْرِ الله تَطْمَئِنُّ القلوب ) أى : ألا بذکره وحده دون غیره من شهوات الحیاه تسکن القلوب أنساً به ، ومحبه له .

ویصح أن یراد بذکر الله هنا ما یشمل القرآن الکریم ، ویشمل ذکر الخالق – عز وجل – باللسان ، فإن إجراءه على اللسان ینبه القلوب على مراقبته – سبحانه – کما یصح أن یراد به خشیته – سبحانه – ومراقبته بالوقوف عند أمره ونهیه .

إلا أن الأظهر هنا أن یراد به القرآن الکریم ، لأنه الأنسب للرد على المشرکین الذین لم یکتفوا به کمعجزه داله على صدقه – صلى الله علیه وسلم – وقالوا لولا أنزل علیه آیه من ربه .

واختیرالفعل المضارع فى قوله – سبحانه – ( تطمئن ) مرتین فى آیه واحده ، للإشاره إلى تجدد الاطمئنان واستمراره ، وأنه لا یتخلله شک ولا تردد .

وافتتحت جمله ( أَلاَ بِذِکْرِ الله تَطْمَئِنُّ القلوب ) بأداه الاستفتاح المفیده للتنبیه ، للاهتمام بمضمونها ، وللإِغراء بالإِکثار من ذکره – عز وجل – ، ولإِثاره الکافرین إلى الاتسام بسمه المؤمنین لتطمئن قلوبهم .

ولا تنافى بیه قوله – تعالى – هنا ( أَلاَ بِذِکْرِ الله تَطْمَئِنُّ القلوب ) وبین قوله فى سوره الأنفال ( إِنَّمَا المؤمنون الذین إِذَا ذُکِرَ الله وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ . . . ) أى : خافت .

لأن وجلهم إنما هو عند ذکر الوعید والعقاب والطمأنینه عند ذکر الوعد والثواب . أو وجلت من هیبته وخشیته – سبحانه – وهو لا ینافى اطمئنان الاعتماد والرجاء .

( الذین آمنوا ) فی محل النصب ، بدل من قوله : من أناب ( وتطمئن ) تسکن ( قلوبهم بذکر الله ) قال مقاتل : بالقرآن ، والسکون یکون بالیقین ، والاضطراب یکون بالشک ( ألا بذکر الله تطمئن القلوب ) تسکن قلوب المؤمنین ویستقر فیها الیقین .

قال ابن عباس : هذا فی الحلف ، یقول : إذا حلف المسلم بالله على شیء تسکن قلوب المؤمنین إلیه .

فإن قیل : ألیس قد قال الله تعالى : ( إنما المؤمنون الذین إذا ذکر الله وجلت قلوبهم ) ( الأنفال – ۲ ) فکیف تکون الطمأنینه والوجل فی حاله واحده ؟

قیل : الوجل عند ذکر الوعید والعقاب ، والطمأنینه عند ذکر الوعد والثواب ، فالقلوب توجل إذا ذکرت عدل الله وشده حسابه ، وتطمئن إذا ذکرت فضل الله وثوابه وکرمه .

الذین آمنوا وتطمئن قلوبهم بذکر الله ) أی : تطیب وترکن إلى جانب الله ، وتسکن عند ذکره ، وترضى به مولى ونصیرا; ولهذا قال : ( ألا بذکر الله تطمئن القلوب ) أی : هو حقیق بذلک .

قوله تعالى : الذین آمنوا الذین فی موضع نصب ، لأنه مفعول ; أی یهدی الله الذین آمنوا . وقیل بدل من قوله : من أناب فهو فی محل نصب أیضا . وتطمئن قلوبهم بذکر الله أی تسکن وتستأنس بتوحید الله فتطمئن ; قال : أی وهم تطمئن قلوبهم على الدوام بذکر الله بألسنتهم ; قال قتاده : وقال مجاهد وقتاده وغیرهما : بالقرآن . وقال سفیان بن عیینه : بأمره . مقاتل : بوعده . ابن عباس : بالحلف باسمه ، أو تطمئن بذکر فضله وإنعامه ; کما توجل بذکر عدله وانتقامه وقضائه . وقیل : بذکر الله أی یذکرون الله ویتأملون آیاته فیعرفون کمال قدرته عن بصیره .

ألا بذکر الله تطمئن القلوب أی قلوب المؤمنین . قال ابن عباس : هذا فی الحلف ; فإذا حلف خصمه بالله سکن قلبه . وقیل : بذکر الله أی بطاعه الله . وقیل : بثواب الله . وقیل : بوعد الله . وقال مجاهد : هم أصحاب النبی – صلى الله علیه وسلم – .

قال أبو جعفر: یقول تعالى ذکره: وَیَهْدِی إِلَیْهِ مَنْ أَنَابَ بالتوبه الذین آمنوا .

* * *

و (الذین آمنوا) فی موضع نصب، ردٌّ على مَنْ, لأن الذین آمنوا ، هم من أناب ، ترجم بها عنها . (۳۳)

* * *

وقوله: وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ ، یقول: وتسکن قلوبهم وتستأنس بذکر الله، (۳۴) کما:-

۲۰۳۵۸- حدثنا بشر قال: حدثنا یزید قال: حدثنا سعید, عن قتاده, قوله: وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ یقول: سکنت إلى ذکر الله واستأنست به .

* * *

وقوله: أَلا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ ، یقول: ألا بذکر الله تسکن وتستأنس قلوبُ المؤمنین . (۳۵)

وقیل: إنه عنى بذلک قلوب المؤمنین من أصحاب رسول الله صلى الله علیه وسلم .

ذکر من قال ذلک:

۲۰۳۵۹- حدثنا الحسن بن محمد قال: حدثنا شبابه قال: حدثنا ورقاء, عن ابن أبی نجیح, عن مجاهد قوله: أَلا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ لمحمد وأصحابه .

۲۰۳۶۰- حدثنی المثنى قال: حدثنا أبو حذیفه قال: حدثنا شبل (۳۶)

۲۰۳۶۱- وحدثنی المثنى قال: حدثنا إسحاق قال: حدثنا عبد الله, عن ورقاء عن ابن أبی نجیح, عن مجاهد: أَلا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ قال: لمحمد وأصحابه .

۲۰۳۶۲- … قال: حدثنا إسحاق قال: حدثنا أحمد بن یونس قال، حدثنا سفیان بن عیینه فی قوله: وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ قال: هم أصحاب محمد صلى الله علیه وسلم .

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الهوامش:

(۳۳) الترجمه ، البدل أو عطف البیان ، وانظر ما سلف قریبًا ص : ۴۲۳ ، تعلیق : ۱ ، والمراجع هناک .

(۳۴) انظر تفسیر الاطمئنان فیما سلف ۱۵ : ۲۵ ، تعلیق ۱ ، والمراجع هناک .

(۳۵) انظر تفسیر الاطمئنان فیما سلف ۱۵ : ۲۵ ، تعلیق ۱ ، والمراجع هناک .

(۳۶) کرر هذا الإسناد فی المطبوعه وحدها ، وقال ناشر المطبوعه الأولى ، کذا فی النسخ بهذا التکرار فانظره ، ولیس مکررًا فی مخطوطتنا ، کأنه لم یرجع إلیها .

استئناف اعتراضی مناسبتهُ المُضادهُ لحال الذین أضلهم الله ، والبیانُ لحال الذین هداهم مع التنبیه على أن مثال الذین ضلوا هو عدم اطمئنان قلوبهم لذکر الله ، وهو القرآن ، لأن قولهم : لولا أنزل علیه آیه من ربه یتضمن أنهم لم یعدوا القرآن آیه من الله ، ثم التصریح بجنس عاقبه هؤلاء ، والتعریض بضد ذلک لأولئک ، فذکرها عقب الجمله السابقه یفید الغرضین ویشیر إلى السببین . ولذلک لم یجعل الذین آمنوا بدلاً من من أناب الرعد : ۲۷ لأنه لو کان کذلک لم تعطف على الصله جمله وتطمئن قلوبهم ولا عطف وعملوا الصالحات على الصله الثانیه . ف الذین آمنوا الأول مبتدأ ، وجمله ألا بذکر اللَّه تطمئن القلوب معترضه و الذین آمنوا الثانی بدل مطابق من الذین آمنوا الأول ، وجمله طوبى لهم خبر المبدأ .

والاطمئنان : السکون ، واستعیر هنا للیقین وعدم الشک ، لأن الشک یستعار له الاضطراب . وتقدم عند قوله تعالى : ولکن لیطمئن قلبی فی سوره البقره ( ۲۶۰ ).

و ( ذکر الله ) یجوز أن یراد به خشیه الله ومراقبته بالوقوف عند أمره ونهیه . ویجوز أن یراد به القرآن قال : وإنه لذکر لک ولقومک سوره الزخرف : ۴۴ ، وهو المناسب قولهم : لولا أنزل علیه آیه من ربه . وعلى هذا المعنى جاء قوله تعالى فی سوره الزمر : فویل للقاسیه قلوبهم من ذکر الله سوره الزمر : ۲۲ ، أی للذین کان قد زادهم قسوه قلوب ، وقوله فی آخرها : ثم تلین جُلودهم وقلوبهم إلى ذکر الله سوره الزمر : ۲۳ .

والذکر من أسماء القرآن ، ویجوز أن یراد ذکر الله باللسان فإن إجراءه على اللسان ینبه القلوب إلى مراقبته .

وهذا وصف لحسن حال المؤمنین ومقایستهِ بسوء حاله الکافرین الذین غمر الشک قلوبهم ، قال تعالى : بل قلوبهم فی غمره من هذا سوره المؤمنون : ۶۳ .

واختیر المضارع فی تطمئن مرتین لدلالته على تجدد الاطمئنان واستمراره وأنه لا یتخلله شک ولا تردد .

وافتتحت جمله إلا بذکر الله بحرف التنبیه اهتماماً بمضمونها وإغراء بوعیه . وهی بمنزله التذییل لما فی تعریف القلوب من التعمیم . وفیه إثاره الباقین على الکفر على أن یتسموا بسمه المؤمنین من التدبیر فی القرآن لتطمئن قلوبهم ، کأنه یقول : إذا علمتم راحه بال المؤمنین فماذا یمنعکم بأن تکونوا مثلهم فإن تلک فی متناولکم لأن ذکر الله بمسامعکم .

«الَّذِینَ» موصول بدل من من فی من أناب «آمَنُوا» ماض وفاعله والجمله صله «وَتَطْمَئِنُّ» مضارع مرفوع «قُلُوبُهُمْ» فاعل والهاء مضاف إلیه «بِذِکْرِ» متعلقان بتطمئن «اللَّهِ» لفظ الجلاله مضاف إلیه والجمله معطوفه «أَلا» حرف تنبیه واستفتاح «بِذِکْرِ» متعلقان بتطمئن «اللَّهِ» لفظ الجلاله مضاف إلیه «تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ» مضارع مرفوع وفاعله والجمله مستأنفه.

Всевышний поведал об отличительных качествах правоверных. При упоминании имени Аллаха они избавляются от беспокойства и волнения и испытывают огромную радость и удовлетворение. Воистину, человеческим сердцам не подобает находить утешение в других вещах, потому что на свете нет ничего более приятного и упоительного, чем любовь к Создателю и познание Его. И чем сильнее человек возлюбил и лучше познал Аллаха, тем лучше он может поминать Его. Это толкование справедливо, если под поминанием Аллаха подразумевается возвеличивание, прославление или другие формы поминания Аллаха рабами. Согласно другому толкованию, под поминанием Аллаха подразумевается Священный Коран, который является напоминанием для правоверных. Из этого толкования следует, что сердца находят утешение, когда знакомятся со смыслом коранических аятов и мудрыми кораническими предписаниями, потому что откровение свидетельствует о непреложной истине, подтверждаемой убедительными доводами и доказательствами. Все это вселяет в человеческие сердца спокойствие и уверенность, которые невозможны без ясного знания и твердой убежденности. Это знание можно найти в писании Аллаха, которому присущи самые совершенные и безупречные качества. Что же касается всех остальных писаний, которые не основываются на коранических знаниях, то они не способны принести человеку утешение. Более того, они порождают беспокойство и тревогу, потому что их доводы и предписания противоречивы. Вот почему Всевышний сказал: «Неужели они не задумываются над Кораном? Ведь если бы он был не от Аллаха, то они нашли бы в нем много противоречий» (۴:۸۲). И всякому, кто изучает Коран и размышляет над смыслом его аятов, а также задумывается над прочими науками, прекрасно известно, что между ними существует огромная разница.

(Yai u o a g-o a g ya g be ima da ya g me asa e a g) e e am (ha i me eka de ga me gi ga Allah) me gi ga ja ji-Nya. (I ga lah, ha ya de ga me gi ga Allahlah ha i me jadi e e am) yak i ha i o a g-o a g ya g be ima .

تفسیر: (الذین آمنوا وتطمئن قلوبهم بذکر الله ألا بذکر الله تطمئن القلوب)

تفسیر: (الذین آمنوا وتطمئن قلوبهم بذکر الله ألا بذکر الله تطمئن القلوب)

♦ الآیه: ﴿ الَّذِینَ آمَنُوا وَتَطْمَئِنُّ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ أَلَا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ ﴾.

♦ السوره ورقم الآیه: الرعد (۲۸).

♦ الوجیز فی تفسیر الکتاب العزیز للواحدی: ﴿ الذین آمنوا ﴾ بدلٌ من قوله: ﴿ مَنْ أناب ﴾ ﴿ وتطمئن قلوبهم بذکر الله ﴾ إذا سمعوا ذکر الله سبحانه وتعالى أحبُّوه واستأنسوا به ﴿ ألا بذکر الله تطمئن القلوب ﴾ یرید: قلوب المؤمنین.

♦ تفسیر البغوی معالم التنزیل: ﴿ الَّذِینَ آمَنُوا ﴾، فِی محل نصب بدلا مِنْ قَوْلِهِ: مَنْ أَنابَ، ﴿ وَتَطْمَئِنُّ ﴾، تَسْکُنُ، ﴿ قُلُوبُهُمْ بِذِکْرِ اللَّهِ ﴾، قَالَ مُقَاتِلٌ: بِالْقُرْآنِ، وَالسُّکُونُ یَکُونُ بِالْیَقِینِ، وَالِاضْطِرَابُ یَکُونُ بِالشَّکِّ، ﴿ أَلا بِذِکْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ ﴾، تَسْکُنُ قُلُوبُ الْمُؤْمِنِینَ وَیَسْتَقِرُّ فِیهَا الْیَقِینُ. قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ: هَذَا فِی الْحَلِفِ، یَقُولُ: إِذَا حَلَفَ الْمُسْلِمُ بِاللَّهِ عَلَى شَیْءٍ تَسْکُنُ قُلُوبُ الْمُؤْمِنِینَ إِلَیْهِ، فَإِنْ قِیلَ: أَلَیْسَ قَدْ قَالَ اللَّهُ تَعَالَى: ﴿ إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِینَ إِذا ذُکِرَ اللَّهُ وَجِلَتْ قُلُوبُهُمْ ﴾ الْأَنْفَالِ: ۲، فَکَیْفَ تَکُونُ الطُّمَأْنِینَهُ وَالْوَجَلُ فِی حَالَهٍ وَاحِدَهٍ؟ قِیلَ: الْوَجَلُ عِنْدَ ذِکْرِ الْوَعِیدِ وَالْعِقَابِ وَالطُّمَأْنِینَهُ عِنْدَ ذِکْرِ الْوَعْدِ وَالثَّوَابِ، فَالْقُلُوبُ تَوْجَلُ إِذَا ذَکَرَتْ عَدْلَ اللَّهِ وَشِدَّهَ حِسَابِهِ، وَتَطْمَئِنُّ إِذَا ذکرت فضل الله وکرمه.

تفسیر القرآن الکریم

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